जनेऊ संस्कार :-
यज्ञोपवीत (संस्कार संधि विच्छेद = यज्ञ +उपवीत) शब्द के दो अर्थ है। उपनयन संस्कार जिसमे जनेऊ पहना जाता है। विधा आरम्भ होता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते है।
पूर्व में बालक की उम्र 8 वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार (जनेऊ) कर दिया जाता है। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गई है। जनेऊ पहले का हमारे स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। विवाह से पूर्व तीन (3) धागो की तथा विवाह उपरांत 6 धागो की जनेऊ धारण की जाती है। इस तीन सूत्रो वाले यज्ञोपवीत त्रिमूर्ति - ब्रम्हा, विष्णु, महेश के प्रतीक होते है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। बिना यज्ञोपवीत धारण किये अन्न, जल ग्रहण नही किया जाता।
पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढ़ने का अधिकार मिलता था। मल - मूत्र विसर्जन से पूर्व जनेऊ को कानो पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिसका सम्बन्ध पेट की आंतो से है। आंतो पर दवाब डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है। तथा कान के पास ही एक नश से ही मल - मूत्र के विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उनके वेग को रोक देती है। जिससे कब्ज, एसिडिटी, पेट रोग, मूत्र-द्रव्य रोग, रक्तचाप, ह्रदय रोग, सहित अन्य संक्रामक रोग नही होते। जनेऊ पहनने वाले नियमो में बंधा होता है। वह मल विसर्जिन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नही सकता जब तक वह हाथ पैर धो कर कुल्ला न कर ले। अतः वह अच्छी तरह से अपनी सफाई कर के ही जनेऊ कान से उतारता है।
यह सफाई उसे दांत, मुँह, पेट, क्रमि जीवाणुओ के रोगो से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ ह्रदय रोगियो को होता है। यज्ञोपवित (जनेऊ) एक संस्कार है। इसके बाद ही बालक का यज्ञ एंव स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। यज्ञोपवित धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है। शरीर के पृष्ठ भाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है। जो विधुत प्रवाह की तरह कार्य करती है। यह रेखा दाये कंधे से लेकर कटी परदेश तक स्थित होती है। यह नैसर्गिक रेखा अतिसूक्ष्म नस है। इसका स्वरुप लाजवन्ती, वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम, क्रोधित विकारो की सीमा नही लांग पता। अपने कंधो पर यज्ञोपवीत है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर होने लगता है। यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमे निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्चर्य नही है। इसीलिए सभी धर्मो में किसी न किसी कारण वश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। सारनाथ की अति प्राचीन बुध प्रतिमा का सूक्ष्म निरिक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। यज्ञोपवीत केवल धर्मज्ञा ही नही बल्कि आरोग्य की पोशाक भी है। अतः इसका सदैव धारण करना चाहिए। शास्त्रो में दाँय कान में महात्म्य का वर्णन भी किया है।
आदित्यवसु, रूद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेगा, आप, सोम, एंव सूर्य आदि देवताओ का निवास दाय कान में होने से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आँचमन का फल प्राप्त होता है। यदि ऐसे पवित्र दाये कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए अशुचित्तव रहता है।
www.panditnmshrimali.com
E-mail :- contact@panditnmshrimali.com
info@panditnmshrimali.com
Contact No. :- 09571122777, 09929391753
यज्ञोपवीत (संस्कार संधि विच्छेद = यज्ञ +उपवीत) शब्द के दो अर्थ है। उपनयन संस्कार जिसमे जनेऊ पहना जाता है। विधा आरम्भ होता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते है।
पूर्व में बालक की उम्र 8 वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार (जनेऊ) कर दिया जाता है। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गई है। जनेऊ पहले का हमारे स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। विवाह से पूर्व तीन (3) धागो की तथा विवाह उपरांत 6 धागो की जनेऊ धारण की जाती है। इस तीन सूत्रो वाले यज्ञोपवीत त्रिमूर्ति - ब्रम्हा, विष्णु, महेश के प्रतीक होते है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। बिना यज्ञोपवीत धारण किये अन्न, जल ग्रहण नही किया जाता।
पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढ़ने का अधिकार मिलता था। मल - मूत्र विसर्जन से पूर्व जनेऊ को कानो पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिसका सम्बन्ध पेट की आंतो से है। आंतो पर दवाब डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है। तथा कान के पास ही एक नश से ही मल - मूत्र के विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उनके वेग को रोक देती है। जिससे कब्ज, एसिडिटी, पेट रोग, मूत्र-द्रव्य रोग, रक्तचाप, ह्रदय रोग, सहित अन्य संक्रामक रोग नही होते। जनेऊ पहनने वाले नियमो में बंधा होता है। वह मल विसर्जिन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नही सकता जब तक वह हाथ पैर धो कर कुल्ला न कर ले। अतः वह अच्छी तरह से अपनी सफाई कर के ही जनेऊ कान से उतारता है।
यह सफाई उसे दांत, मुँह, पेट, क्रमि जीवाणुओ के रोगो से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ ह्रदय रोगियो को होता है। यज्ञोपवित (जनेऊ) एक संस्कार है। इसके बाद ही बालक का यज्ञ एंव स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। यज्ञोपवित धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है। शरीर के पृष्ठ भाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है। जो विधुत प्रवाह की तरह कार्य करती है। यह रेखा दाये कंधे से लेकर कटी परदेश तक स्थित होती है। यह नैसर्गिक रेखा अतिसूक्ष्म नस है। इसका स्वरुप लाजवन्ती, वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम, क्रोधित विकारो की सीमा नही लांग पता। अपने कंधो पर यज्ञोपवीत है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर होने लगता है। यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमे निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्चर्य नही है। इसीलिए सभी धर्मो में किसी न किसी कारण वश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। सारनाथ की अति प्राचीन बुध प्रतिमा का सूक्ष्म निरिक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। यज्ञोपवीत केवल धर्मज्ञा ही नही बल्कि आरोग्य की पोशाक भी है। अतः इसका सदैव धारण करना चाहिए। शास्त्रो में दाँय कान में महात्म्य का वर्णन भी किया है।
आदित्यवसु, रूद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेगा, आप, सोम, एंव सूर्य आदि देवताओ का निवास दाय कान में होने से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आँचमन का फल प्राप्त होता है। यदि ऐसे पवित्र दाये कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए अशुचित्तव रहता है।
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